खेत-खलिहानों और किसानों के कई योजनाओं को समेटे एक लाख 54 हजार करोड़ रुपए के महाबजट का तीसरा कृषि रोड मैप का आगाज राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कर दिया है, लेकिन आजादी के 70 साल बाद बाद भी बिहार भू-सुधार की बाट जोह रहा है.

ये सूबे का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आजादी के बाद दसियों सरकारें बनीं लेकिन भू-सुधार के सारे प्रयास विफल रहे. कांग्रेस की अगुआई वाली शुरुआती सरकारों ने इसकी कोशिश की लेकिन सत्ता पर उच्च जातियों के असर ने इसे बेअसर कर दिया.

लालू प्रसाद ने 1990 में इसे चुनावी मुद्दा बनाया पर वह भी भूमि सुधार की दिशा में कोई कदम नहीं बढ़ा सके. 2006 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब डी बंदोपाध्याय आयोग का गठन किया तो किसानों की उम्मीदें जगी. 2008 में आयोग ने अपनी सिफारिशें भी सरकार को सौंप दी. एक बार फिर विरोध शुरू हुआ.

खेतिहर जमीन पर बटाईदारों का हक मजबूत करने की खबर से नीतीश की पार्टी में ही विरोध शुरू हो गया. आखिरकार नीतीश सरकार ने भी बंदोपाध्याय आयोग की सिफारिशों को तहखाने में रख दिया.
हालांकि नीतीश कुमार के कार्यकाल में जमीनों के डिजिटल रिकॉर्ड का काम पूरा किया गया. पर सभी होल्डिंग में मालिकों का नाम दो से तीन पीढ़ी पहले का है क्योंकि ताजा सर्वे हुआ नहीं है. इसके कारण कई बार जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल में दिक्कत होती है क्योंकि दादा-परदादा के नाम पर दर्ज जमीन को बैंक से लोन के लिए मोर्टगेज नहीं किया जा सकता.​

बिहार में कृषि के आंकड़ें  

आखिरी भू-सर्वेक्षण – 1911
जीडीपी में कृषि का योगदान – 33 फीसदी
भू-सुधार आयोग – 2006
राजस्व भूमि का ताजा सर्वे – 2016 (जारी है)
डिजिटल लैंड रिकॉर्ड – काम पूरा
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